महात्मा गांधी के आंदोलन, जिन्होंने बदल डाला भारत का स्वरूप

uploaded on : 2017-10-03 09:39:01

2 अक्तूबर को देश महात्मा गांधी की 147वीं जयंती मना रहा है। महात्मा गांधी ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में न सिर्फ योगदान दिया बल्कि उसकी स्पष्ट रूपरेखा भी तय की। गांधी जी ने देश में कई आंदोलन छेड़े जिनका असर देश से लेकर जनमानस पर दूर तक पड़ा। आइए जानते हैं कि गांधी किन किन आंदोलनों के सूत्रधार रहे।
नागरिक अधिकारों के लिए आंदोलन
गांधी जब दक्षिण अफ्रीका गए तो वहां उस वक्त रंगभेदी मानसिकता हावी थी और उसी के चलते कदम कदम पर भेदभाव और प्रताड़ना सहनी पड़ी। फर्स्ट क्लास का टिकट होने के बावजूद उन्हें तीसरी श्रेणी के डिब्बे में यात्रा करनी पड़ी। अंग्रेजों ने उन्हें कोच में घुसने नहीं दिया और प्रतिकार करने पर उन्हें ट्रेन से नीचे धकेल दिया गया। वहां के होटलों में भी उनका प्रवेश वर्जित था, अदालत में पहुंचने पर टोपी उतारने का आदेश उन्हें व्यथित कर गया और उन्होंने तय किया कि समान अधिकारों के लिए वो आंदोलन करेंगे ताकि सामाजिक अन्याय के खिलाफ जागरुकता फैल सके और जनता अपने अधिकारों को लेकर सजग हो सके।
उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में नागरिक अधिकारों के लिए आंदोलन किया जिसके चलते उन्हें बहुत प्रताड़ित भी किया गया लेकिन आखिरकार आंदोलन रंग लाया और दक्षिण अफ्रीका में समान नागरिक अधिकार बहाल हुए। इसका असर भारत पर भी पड़ा और भारत में समान अधिकारों की मांग उठने लगी जो स्वतंत्रता आंदोलन में बहुत बड़ी लहर बनकर उठी।
हरिजन आंदोलन
1932 में गांधी जी ने हरिजन आंदोलन का आगाज किया जिसका मकसद था कि अंग्रेजी सरकार हरिजनों के लिए चुनाव की अलग व्यवस्था न कर पाए और भी भारतीय जनमानस का अभिन्न अंग माने जाएं। वो गांधी जी ही थे जिन्होंने अछूत शब्द का विरोध करते हुए दलितों के लिए हरिजन शब्द ईजाद किया और उन्हें समान हक दिलाने के लिए छह तक तक अनशन भी किया। गांधी जी छुआछूत को एक सामाजिक बुराई मानते थे और इसी के खिलाफ वे जीवन पर्यत संघर्षरत रहे।
नमक आंदोलन
इसे नमक सत्याग्रह के नाम जाना जाता है। 1930 में अंग्रेजी सरकार द्वारा नमक पर टैक्स लगाने के विरोध में गांधी जी ने नमक आंदोलन का आह्वान किया। इस कर के विरोध में गांधी जी ने जनता से दांडी मार्च का आह्वान किया। इस मार्च के तहत गांधी जी 12 मार्च से 6 अप्रैल तक 400 किलोमीटर तक का पैदल सफर कर अहमदाबाद से दांडी तक पहुंचे और समुद्र किनारे नमक उठाकर अंग्रेजी फैसले का प्रतिकार किया।
हजारों की संख्या में भारतीय जनमानस ने इस दांडी मार्च में भाग लेकर स्वयं नमक पैदा करने का प्रण किया। यह फैसला और आंदोलन गांधी जी के सबसे सफल आंदोलनों में से एक था जिसने अंग्रेजी सरकार को इतना डरा दिया कि दांडी मार्च में जाने से रोकने के लिए करीब 80 हजार लोग जेलों में ठूंस दिए गए।
असहयोग आंदोलन
महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम के तहत असहयोग,अहिंसा को अंग्रेजों के खिलाफ अस्त्र के रूप में प्रयोग किया। इन्हीं में से एक था असहयोग आंदोलन। स्वदेशी नीति को बढ़ावा देने के लिए भी इस आंदोलन को इस्तेमाल किया गया। इसके तहत भारतीयों को विदेशी कपड़े, वस्तुओं और अंग्रेजों की नौकरी का त्याग करने का आह्वान किया गया। विदेशी कपड़ों ही होली जलाई जाने लगी, घर घर में सूत काता जाने लगा। स्वदेशी सामान को प्रोत्साहित किया जाने लगा। सम्माननीय लोगों ने सरकार की बड़ी बड़ी नौकरियां छोड़ दी, अंग्रेजों के शिक्षण संस्थान और अदालतों का बहिष्कार किया जाने लगा, माननीयों ने अंग्रेजों द्वारा दिए गए सम्मान और मैडल लौटा दिए।
गांधी जी के इस आह्वान का असर पूरे देश पर देखने को मिला। जनता के बीच देश के प्रति जोश और समाज में सहयोग के लिए भावना पैदा हुई और अंग्रेजी वस्तुओं के प्रति उदासीनता बढ़ी।
हालांकि 1922 में चौरा चौरी कांड में असहयोग आंदोलन के तहत हिंसा हुई तो गांधी जी ने व्यापक असहयोग आंदोलन को वापस लेने की घोषणा कर दी।